वॉशिंगटन डीसी। अमेरिका में वजन घटाने के लिए इस्तेमाल होने वाली दवा ओजेम्पिक की नकली दवा बेचने के आरोप में दो भारतीय नागरिकों के खिलाफ केस दर्ज किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक दोनों चीन से कम कीमत पर नकली ओजेम्पिक मंगाते थे और फिर इसे अमेरिका में डिस्ट्रीब्यूटर्स को बेचते थे।
दोष साबित होने पर दोनों को अलग-अलग आरोपों में अधिकतम 71 साल तक की जेल की सजा हो सकती है। अमेरिकी फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एफडीआई) ने ओजेम्पिक को 2017 में टाइप-2 डायबिटीज के इलाज के लिए मंजूरी दी थी। नकली दवा की पैकिंग बिल्कुल असली जैसी थी:-जांच में सामने आया कि नकली दवा की पैकिंग को इस तरह तैयार किया गया था कि वह बिल्कुल असली ओजेम्पिक जैसी दिखाई दे। इसके बॉक्स, दवा की जानकारी वाली पर्ची, इंजेक्शन पेन का लेबल और यहां तक कि सुई भी असली दवा जैसी थी। इसका मकसद यह था कि खरीदारों को दवा नकली होने का पता न चले और उन्हें लगे कि वे कंपनी की असली दवा खरीद रहे हैं। दोनों आरोपियों की पहचान स्वप्नदीप रॉय और विक्की रमनचा के रूप में हुई है। एफडीए ने 2023 में नकली ओजेम्पिक को लेकर चेतावनी दी थी:-अमेरिकी दवा नियामक एफडीए ने दिसंबर 2023 में नकली ओजेम्पिक की कुछ खेप पकड़ी थी। इसके बाद लोगों को नकली दवा से सावधान रहने की चेतावनी भी दी गई थी।
अमेरिकी अधिकारियों का आरोप है कि इसके बावजूद दोनों आरोपी नकली दवा की बिक्री में शामिल रहे। एक आरोपी के खिलाफ इंटरपोल का रेड नोटिस जारी हुआ था:-अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, स्वप्नदीप रॉय को इटली में गिरफ्तार किया गया था। उसके खिलाफ इंटरपोल का रेड नोटिस भी जारी हुआ था। रेड नोटिस का मतलब है कि इंटरपोल से जुड़े देशों को किसी व्यक्ति की तलाश और संभावित गिरफ्तारी के लिए सूचना दी जाती है। हालांकि, यह अपने आप में किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी का अंतरराष्ट्रीय वारंट नहीं होता। बाद में अमेरिका ने इटली से रॉय के प्रत्यर्पण की मांग की। मंगलवार को उसे फ्लोरिडा के टैम्पा शहर की अदालत में पेश किया गया। रॉय और रमनचा पर कुल 6 आरोप लगाए गए हैं।
इनमें तस्करी की साजिश, तस्करी और नकली दवा बेचने से जुड़े आरोप शामिल हैं। अमेरिका नकली दवाओं पर कैसे नजर रखता है? अमेरिका में नकली दवाओं को रोकने के लिए दवा की पूरी सप्लाई चेन पर नजर रखी जाती है। दवा बनाने वाली कंपनी से लेकर थोक विक्रेता और मेडिकल स्टोर तक, अलग-अलग स्तर पर लाइसेंस और रजिस्ट्रेशन की व्यवस्था होती है। कई दवाओं का रिकॉर्ड इलेक्ट्रॉनिक तरीके से भी रखा जाता है। इससे यह पता लगाने में मदद मिलती है कि दवा कहां बनी, किसके पास गई और किसने उसे बेचा। मेडिकल स्टोर को भी दवा की खरीद और बिक्री का रिकॉर्ड रखना पड़ता है।
अगर किसी दवा के नकली होने का शक होता है तो उसे अलग कर जांच की जाती है। नकली पाए जाने पर इसकी जानकारी एफडीए को दी जाती है और दवा को बाजार से हटाने की कार्रवाई की जाती है। इसके बावजूद नकली दवाएं कभी-कभी ऑनलाइन बिक्री, तस्करी या अवैध सप्लायरों के जरिए बाजार तक पहुंच जाती हैं। ऐसे मामलों में एफडीए और दूसरी अमेरिकी एजेंसियां जांच करती हैं और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाती है। इस मामले में भी अमेरिकी अधिकारियों का आरोप है कि आरोपियों ने नकली ओजेम्पिक को असली दवा जैसा दिखाकर अमेरिकी बाजार में पहुंचाया।